Tuesday, January 31, 2006

कबीर की धरती में कुछ दिन गाते हुए

सूफी गायक ने कबीर दोहे गाकर बांधा समा

संवाददाता, बस्ती
शहर के गौरी दत्त धर्मशाला में मंगलवार की रात आयोजित कबीर स्मृति समारोह में सूफी गायक भारती बन्धु का कबीर गायन लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा । कभी उनकी कबीर वाणी तो कभी नयी सीख देने वाले शेर को सुनकर लोग बरबस ही वाह-वाह करने पर मजबूर हो रहे थे । सूफी कलाकारों के अनोखे अंदाज को देख तालियों की आवाज हर जगह से उठ रहे रही थी । देर रात तक चले कार्यक्रम में श्रोता कबीर रस व भक्ति भाव की अविरल धारा में गोता लगाते रहे । कबीर स्मृति समारोह कार्यक्रम की शुरूआत बतौर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी रमेन्द्र त्रिपाठी ने दीप प्रज्जवलन कर किया । इसके बाद सूफी गायक भारती बन्धु के नेतृत्व में कलाकारों की टीम जब मंचस्थ हुई तो मानो कबीर दोहों का शमां बंध गया हो । श्री भारती ने पहले “मन लागो मेरो यार फकीरी में, जो सुख पाई राम भजन में सो सुख नाहीं अमीरी में” गीत सुनाया तो लोग भाव-विह्वल हो गये । इसके बाद “प्रेम न बाडी उपजे, प्रेम न हाट बिकाये” कबीर का दोहा सुनकर लोग वाह-वाह कर उठे । फिर तो कबीर दास के दोहे व निर्गुण भक्ति धारा की गीतों का क्रम टूटने का नाम ही नही ले रहा था । यही नहीं श्री भारती द्वारा प्रस्तुत आखिर “ये तन खाक मिलेगा काहे फिरत मगरूरी में” व “लाठी मारे ज्ञान से अंग-अंग फुट जाये, ज्ञानी मारे ज्ञान से अंग-अंग भिन जाये ” जैसे दोहे व गीत जहाँ लोगों को अलग सीख दे रहे थे । वहीं “क्या देखता है किस्मत हाथों की लकीरों में, ठुकरा दे जमाने को आ बैठ जा फकीरों में” नामक दोहा कबीरपंथी बनने की प्रेरणा दे रहा था । उन्होंने जब अपनी प्रसिद्ध रचना- जरा-धीरे गाडी हांको मोरे राम गाडी वाले सुनाया तो लगा मानवीय संवेदना में डूब गये । यही नहीं “ मोरे नैना में राम रंग छाये रहा हो..... गीत से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया । इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक अमिताभ ठाकुर, अपर पुलिस अधीक्षक राहुल यादवेन्दु, सी.ओ, सदर ओ. पी. सिंह, दिनेश दूबे, उप बेसिक शिक्षा अधिकारी माता प्रसाद अवस्थी, उदय शंकर शुक्ल, सुभाष तिवारी, राणा सिंह, भाजपा नेता महेश शुक्ल, दुर्गा दत्त पांडेय, अयोध्या प्रसाद शुक्ल, वीरेन्द्र पाण्डेय, अयोध्या प्रसाद शुक्ल, वीरेन्द्र नाथ पाण्डेय समेत तमाम लोग मौजूद रहे ।
(दैनिक जागरण, बस्ती, 12 जनवरी 2006पृष्ठ 3 से साभार)


सुफी गायन से मिलता है आत्मिक सुखः भारती बन्धु

निज प्रतिनिधि, बस्ती
भारती बन्धु परिवार के सूफी गायक स्वामी जी.सी.डी.भारती ने कहा कि सूफी गायन अपने आप में एक अलग तरह की परम्परा है । इससे जहाँ स्वयं को आत्मिक सुख मिलता है वहीं जन चेतना फैलाने में भी काफी मदद मिलती है । कबीर पंथी सूफी गायक होने के नाते मेरा यह भी प्रयास है कि लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ विश्वशांति की कल्पना भी साकार किया जाये ।
श्री भारती मंगलवार को रोडवेज-दक्षिण दरवाजा मार्ग स्थित एक होटल पर पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे । उन्होंने बताया कि देश के विभिन्न प्रांतों में लगभग पाँच हजार कार्यक्रम पेश कर चुका हूँ, लेकिन कबीर की जन्म स्थली मगहर में गाने का मौका पहली बार मिल रहा है । यह मेरे लिये अत्यन्त सौभाग्य की बात है । गायन के लिये कबीर को चुनने का कारण पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि कबीर की वाणी ऐसी है कि थोडा भी यदि कहा जाय तो उसका गहरा प्रभाव होता है । सामाजिक रूढियों पर चोट करने व समाज सुधार की संकल्पना को पूर्ण करने का भी मौका मिलता है । एक प्रश्न के जबाब में उन्होंने कहा कि मगहर में कार्यक्रम पेश करने का संकल्प अब पूरा हो चुका है सो अब देश से बाहर भी जागृति लाने का प्रयास करूँगा । शिक्षा-दीक्षा के सम्बन्ध में पूछे जाने पर सूफी गायक ने बताया कि कबीर की भाँति मैं भी पढा नहीं हूँ ।
(दैनिक जागरण, बस्ती, 11 जनवरी 2006, पृष्ठ 3से साभार)

कबीर को जिये बगैर उन्हें गाया नहीं जा सकताः स्वामी भारती

बस्ती(हि.सं) । कबीर का जीवन जिये बगैर कबीर को गाया नहीं जा सकता है । यह कथन है छत्तीसगढ के प्रसिद्ध कबीरपंथी गायक स्वामी जी.एस.डी.भारती का । वे बस्ती में आयोजित कबीर स्मृति समारोह में भाग लेने आये हुए हैं । जिनका मानना है कि वर्तमान समय में पूरे विश्व को कबीर वाणी की आवश्यकता है ।
छत्तीसगढ के रायपुर में जन्मे स्वामी भारती को गायन विरासत में मिला । कई बार सम्मानित होने वाले भारती बन्धुओं को कबीर गायक माना जाता है । बस्ती में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आये भारती बन्धुओं ने बताया कि अब तक पिछले 30 वर्षों में 5000 कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं । फकीरी, सूफी सहित कई शैलियों में कबीर की वाणी का गायन करने वाले स्वामी भारती कहते हैं कि बिना कबीर का जीवन जिये उनके वाणी को गाया नहीं जा सकता है ।
कबीर स्मृति समारोह
गायन आत्मा की आवाज होती है और मुझे स्वयं ही नहीं मालूम कि कबीर ने कब मुझे चुन लिया । पूरे विश्व में युद्ध कटुता बढी हुई है, ऐसे में विश्वशांति के लिए कबीर वाणी की सर्वाधिक आवश्यकता है ।
विदेशों में कार्यक्रम प्रस्तुत करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कबीर की जन्मस्थली वाराणसी में कार्यक्रम तो प्रस्तुत किया था लेकिन मन में तमन्ना थी कि बस्ती, संत कबीर नगर की धरती में मगहर में कार्यक्रम प्रस्तुत करने के बाद उनकी तमन्ना पूरी हो रही है । उसके बाद ही विदेशों में कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाएगा ।
(हिन्दुस्तान, लखनउ, बुधवार, 11 जनवरी 2006, पृष्ठ 6 से साभार
)

0 Comments:

Post a Comment

<< Home